| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन » श्लोक 92 |
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| | | | श्लोक 3.200.92  | व्रजे वाप्यथवारण्ये यत्र सन्ति बहुश्रुता:।
तत् तन्नगरमित्याहु: पार्थ तीर्थं च तद् भवेत्॥ ९२॥ | | | | | | अनुवाद | | हे कुन्तीपुत्र! चाहे वह व्रज (गायों का निवास स्थान) हो या वन, जहाँ विद्वान् विद्वान् निवास करते हों, वह नगर कहलाता है और तीर्थ भी माना जाता है ॥92॥ | | | | O son of Kunti! Be it Vraj (place where cows live) or a forest, where learned scholars reside, it is called a city and is also considered a pilgrimage place. ॥92॥ | | ✨ ai-generated | | |
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