श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 89
 
 
श्लोक  3.200.89 
यथा श्मशाने दीप्तौजा: पावको नैव दुष्यति।
एवं विद्वानविद्वान् वा ब्राह्मणो दैवतं महत्॥ ८९॥
 
 
अनुवाद
जैसे श्मशान में भी जलती हुई अग्नि कभी दूषित नहीं होती, वैसे ही ब्राह्मण को भी, चाहे वह विद्वान हो या अशिक्षित, महान देवता समझना चाहिए ॥89॥
 
Just as a burning fire does not get polluted even in a cremation ground, similarly a Brahmin, whether learned or uneducated, should be considered a great god. 89॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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