श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 88
 
 
श्लोक  3.200.88 
दुर्वेदा वा सुवेदा वा प्राकृता: संस्कृतास्तथा।
ब्राह्मणा नावमन्तव्या भस्मच्छन्ना इवाग्नय:॥ ८८॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण का अपमान नहीं करना चाहिए, चाहे उसने वेदों का भलीभाँति अध्ययन किया हो या नहीं, चाहे उसके संस्कार अच्छे हों या वह स्वाभाविक मनुष्यों के समान संस्कारों से रहित हो; क्योंकि वह राख में छिपी हुई अग्नि के समान है ॥88॥
 
A brahmin should not be insulted whether he has studied the Vedas well or not, whether he has good sanskars (culture) or whether he is devoid of sanskars like natural men; for he is like a fire hidden in ashes. ॥ 88॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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