श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 86
 
 
श्लोक  3.200.86 
सर्वे नानुगतं चैनं दारुणा: पिशिताशना:।
घोररूपा महाकाया धर्षयन्ति द्विजोत्तमम्॥ ८६॥
 
 
अनुवाद
भयानक रूप और विशाल शरीर वाले समस्त क्रूर और मांसभक्षी राक्षस भी उस गायत्री-जप में तत्पर श्रेष्ठ ब्राह्मण पर आक्रमण नहीं कर सकते ॥ 86॥
 
All the cruel and flesh-eating demons, having a fearsome appearance and huge body, cannot attack that great Brahmin who is devoted to the chanting of Gayatri. ॥ 86॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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