Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.200.85: इतना ही नहीं, आकाश में सूर्य आदि जो भी ग्रह उसके लिए भयकारक हैं, वे भी उपर्युक्त गायत्री जप के प्रभाव से उसके लिए सदैव सौम्य, सुखद और अत्यंत शुभ हो जाते हैं ॥ 85॥ | mahabharat अध्याय 3.200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
ये चास्य दारुणा: केचिद् ग्रहा: सूर्यादयो दिवि।
ते चास्य सौम्या जायन्ते शिवा: शिवतरा: सदा॥ ८५॥
अनुवाद
इतना ही नहीं, आकाश में सूर्य आदि जो भी ग्रह उसके लिए भयकारक हैं, वे भी उपर्युक्त गायत्री जप के प्रभाव से उसके लिए सदैव सौम्य, सुखद और अत्यंत शुभ हो जाते हैं ॥ 85॥
Not only this, whichever planets in the sky like the Sun etc. are fearful for him, they always become mild, pleasant and extremely auspicious for him due to the effect of the above-mentioned Gayatri Japa. ॥ 85॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥