श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 82
 
 
श्लोक  3.200.82 
मार्कण्डेय उवाच
वाक्शौचं कर्मशौचं च यच्च शौचं जलात्मकम्।
त्रिभि: शौचैरुपेतो य: स स्वर्गी नात्र संशय:॥ ८२॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेयजी बोले- राजन! शौच तीन प्रकार का होता है- वाक्षौच (वाणी की शुद्धि), कर्मौच (कर्म की शुद्धि) और जलौच (जल से शरीर की शुद्धि)। जो इन तीन प्रकार के शौच से युक्त है, वह स्वर्ग का अधिकारी है, इसमें संशय नहीं है॥82॥
 
Markandeyaji said- Rajan! There are three types of defecation – Vaakshauch (purity of speech), Karmashauch (purity of action) and Jalshauch (purification of the body with water). One who is equipped with these three types of defecation is entitled to heaven, there is no doubt about it. 82॥
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