श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 81
 
 
श्लोक  3.200.81 
युधिष्ठिर उवाच
किं तच्छौचं भवेद् येन विप्र: शुद्ध: सदा भवेत्।
तदिच्छामि महाप्राज्ञ श्रोतुं धर्मभृतां वर॥ ८१॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा - धर्मात्माओं में श्रेष्ठ महर्षि! वह कौन-सा शौच है जिससे ब्राह्मण सदैव पवित्र रहता है? मैं उसे सुनना चाहता हूँ॥81॥
 
Yudhishthir asked – Maharishi, the best among the religious souls! What is that defecation by which a Brahmin always remains pure? I want to hear him. 81॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)