श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 80
 
 
श्लोक  3.200.80 
वीतशोकभयक्रोधा विपाप्मानस्तथैव च।
श्रुत्वेमां तु कथां राजन्न भवन्तीह मानवा:॥ ८०॥
 
 
अनुवाद
राजन! इस कथा को सुनने से मनुष्य शोक, भय, क्रोध और पाप से मुक्त हो जाते हैं और पुनः इस संसार में जन्म नहीं लेते।
 
King! After listening to this story men become free from grief, fear, anger and sin and do not take birth in this world again. 80.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)