| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन » श्लोक 79 |
|
| | | | श्लोक 3.200.79  | धर्माश्रितेयं तु कथा कथितेयं तवानघ।
यां श्रुत्वा मुनय: प्रीता नैमिषारण्यवासिन:॥ ७९॥ | | | | | | अनुवाद | | हे निष्पाप युधिष्ठिर! मैंने यह कथा धर्मानुसार कही है। यह सुनकर नैमिषारण्य में रहने वाले ऋषिगण बहुत प्रसन्न हुए। | | | | Sinless Yudhishthira! I have narrated this tale in accordance with Dharma. On hearing this, the sages residing in Naimisharanya were very pleased. | | ✨ ai-generated | | |
|
|