श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 76
 
 
श्लोक  3.200.76 
अपानपा न गदितास्तथान्ये ये द्विजातय:।
जपन्ति संहितां सम्यक् ते नित्यं तारणक्षमा:॥ ७६॥
 
 
अनुवाद
जो लोग मदिरा नहीं पीते, जिन पर कोई अपराध का आरोप नहीं लगा है, तथा जो अन्य द्विज लोग वेदों का विधिपूर्वक पाठ करते हैं, वे सदैव दूसरों का उद्धार करने में समर्थ होते हैं ॥ 76॥
 
Those who do not drink liquor, who have not been accused of any crime, and other twice-born people who properly recite the Vedas are always capable of saving others. ॥ 76॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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