श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 75
 
 
श्लोक  3.200.75 
अन्तर्जानुशयो यस्तु भुङ्‍‍क्ते संसक्तभाजन:।
यो द्विज: शब्दरहितं स क्षमस्तारणाय वै॥ ७५॥
 
 
अनुवाद
जो ब्राह्मण घुटनों के पीछे हाथ रखकर तथा एक हाथ बर्तन पर रखकर चुपचाप भोजन करता है, वह अपना तथा दूसरों का उद्धार करने में समर्थ होता है ॥ 75॥
 
A Brahmin who eats his food silently with his hands placed behind his knees and one hand on the vessel is capable of saving himself and others. ॥ 75॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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