श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 74
 
 
श्लोक  3.200.74 
ससमुद्रगुहा तेन सशैलवनकानना।
चतुरन्ता भवेद् दत्ता पृथिवी नात्र संशय:॥ ७४॥
 
 
अनुवाद
इसमें कोई संदेह नहीं कि उस गौ का दान करने से समुद्र, गुफा, पर्वत, वन और जंगल सहित चारों दिशाओं में भूमि दान करने के बराबर पुण्य प्राप्त होता है ॥ 74॥
 
There is no doubt that by donating that cow one gets the merits equivalent to donating land in all the four directions including the sea, cave, mountain, forest and jungles. ॥ 74॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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