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mahabharat 3.200.71: युधिष्ठिर! इस दान से दानकर्ता उस गाय और बछड़े के शरीर पर जितने रोम हैं, उतने हजार युगों तक स्वर्ग में स्थान प्राप्त करता है ॥ 71॥   |   mahabharat अध्याय 3.200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 71
 
 
श्लोक  3.200.71 
यावन्ति तस्या रोमाणि वत्सस्य च युधिष्ठिर।
तावद् युगसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते॥ ७१॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर! इस दान से दानकर्ता उस गाय और बछड़े के शरीर पर जितने रोम हैं, उतने हजार युगों तक स्वर्ग में स्थान प्राप्त करता है ॥ 71॥
 
Yudhishthira! By donating this, the donor attains a place in heaven for as many thousands of yugas as the number of hairs on the body of that cow and calf. ॥ 71॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)