श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 70
 
 
श्लोक  3.200.70 
अन्तरिक्षगतो वत्सो यावद् योन्यां प्रदृश्यते।
तावद् गौ पृथिवी ज्ञेया यावद् गर्भं न मुञ्चति॥ ७०॥
 
 
अनुवाद
जब तक बछड़ा योनि से बाहर आते समय आकाश में लटका हुआ दिखाई दे, जब तक गाय अपने बछड़े को योनि से पूर्णतः अलग न कर दे, तब तक उस गाय को पृथ्वी ही समझना चाहिए। 70.
 
Till the time the calf is seen hanging in the sky while coming out of the vagina, till the time the cow does not completely separate its calf from the vagina, that cow should be considered as the Earth. 70.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)