श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 69
 
 
श्लोक  3.200.69 
यावद् वत्सस्य वै पादौ शिरश्चैव प्रदृश्यते।
तस्मिन् काले प्रदातव्या प्रयत्नेनान्तरात्मना॥ ६९॥
 
 
अनुवाद
जब गर्भवती गाय बच्चे को जन्म दे रही हो और बछड़े का केवल सिर और दो पैर ही दिखाई दे रहे हों, तब शुद्ध भाव से उसी समय प्रयत्नपूर्वक गाय का दान करना चाहिए ॥69॥
 
When a pregnant cow is giving birth and only the head and two legs of the calf are visible, then with pure intentions one should try and donate the cow at that very moment. ॥ 69॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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