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mahabharat 3.200.68: अग्निदेव ब्राह्मण का स्वागत करने से, इन्द्र उसे आसन देने से, पितर उसके चरण धोने से और ब्रह्माजी उसे अन्न देने से संतुष्ट होते हैं ॥68॥   |   mahabharat अध्याय 3.200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  3.200.68 
स्वागतेनाग्नयस्तृप्ता आसनेन शतक्रतु:।
पितर: पादशौचेन अन्नाद्येन प्रजापति:॥ ६८॥
 
 
अनुवाद
अग्निदेव ब्राह्मण का स्वागत करने से, इन्द्र उसे आसन देने से, पितर उसके चरण धोने से और ब्रह्माजी उसे अन्न देने से संतुष्ट होते हैं ॥68॥
 
Agni is satisfied by welcoming a Brahmin, Indra by giving him a seat, ancestors by washing his feet and Brahmaji is satisfied by providing him edible food. 68॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)