श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  3.200.67 
द्विजपादोदकक्लिन्ना यावत् तिष्ठति मेदिनी।
तावत् पुष्करपर्णेन पिबन्ति पितरो जलम्॥ ६७॥
 
 
अनुवाद
जब तक पृथ्वी ब्राह्मणों के चरण धोने के जल से गीली रहती है, तब तक पितर कमल के पत्तों से जल पीते हैं। 67.
 
As long as the earth remains wet with the water from washing the feet of Brahmins, the ancestors drink water from the lotus leaves. 67.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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