श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  3.200.66 
कपिलायां तु दत्तायां यत् फलं ज्येष्ठपुष्करे।
तत् फलं भरतश्रेष्ठ विप्राणां पादधावने॥ ६६॥
 
 
अनुवाद
हे भारतश्रेष्ठ! ज्येष्ठ पुष्कर तीर्थ में कपिला गाय का दान करने से जो फल प्राप्त होता है, वही फल ब्राह्मणों के चरण धोने से प्राप्त होता है ॥66॥
 
Bharatshrestha! The same result that is obtained by donating Kapila cow in Jyeshtha Pushkar Teerth is the same result that is obtained by washing the feet of Brahmins. 66॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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