श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  3.200.65 
मार्कण्डेय उवाच
धर्मान्तरं प्रति कथां कथ्यमानां मया नृप।
सर्वपापहरां नित्यं शृणुष्वावहितो मम॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेय जी बोले, "हे राजन! अब मैं तुमसे धर्म सम्बन्धी अन्य बातें कहता हूँ, जो सदैव समस्त पापों का नाश करने वाली हैं। तुम सावधान होकर सुनो।"
 
Markandeya said, "O King! Now I am telling you other things related to Dharma, which always destroy all sins. You listen carefully. 65.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)