श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  3.200.64 
युधिष्ठिर उवाच
पुन: पुनरहं श्रोतुुं कथां धर्मसमाश्रयाम्।
पुण्यामिच्छामि धर्मज्ञ कथ्यमानां त्वया विभो॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले- धर्मात्मा विभो! मैं आपके द्वारा बार-बार की गई धर्ममय धर्म की चर्चा सुनना चाहता हूँ॥64॥
 
Yudhishthir said- Religious Vibho! I want to hear the virtuous religion discussed by you again and again. 64॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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