श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  3.200.59 
ये च दुष्कृतकर्माण: पूयं तेषां विधीयते।
एवं नदी महाराज सर्वकामप्रदा हि सा॥ ५९॥
 
 
अनुवाद
महाराज! इस प्रकार वह नदी समस्त कामनाओं को पूर्ण करती है; किन्तु जो पापी हैं, उनके लिए उस नदी का जल मवाद बन जाता है ॥59॥
 
Maharaj! Thus that river fulfils all the desires; but for those who are sinful, the water of that river becomes pus. ॥ 59॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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