| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन » श्लोक 57-58 |
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| | | | श्लोक 3.200.57-58  | पानीयस्य गुणा दिव्या: प्रेतलोकसुखावहा:॥ ५७॥
तत्र पुष्पोदका नाम नदी तेषां विधीयते।
शीतलं सलिलं तत्र पिबन्ति ह्यमृतोपमम्॥ ५८॥ | | | | | | अनुवाद | | जलदान का प्रभाव अत्यंत अलौकिक होता है। इससे परलोक में सुख मिलता है। जो पुण्यात्मा जलदान करते हैं, उन्हें उस मार्ग में पुष्पोदका नामक नदी मिलती है। वे उसका शीतल एवं अमृत के समान मीठा जल पीते हैं। 57-58 | | | | The effect of donating water is extremely supernatural. It brings happiness in the next world. Those pious souls who donate water find a river named Pushpodaka on that path. They drink its cool and sweet water like nectar. 57-58. | | ✨ ai-generated | | |
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