श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  3.200.52 
हिरण्यदा: सुखं यान्ति पुरुषास्त्वभ्यलंकृता:।
भूमिदास्तु सुखं यान्ति सर्वै: कामै: सुतर्पिता:॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
जो लोग स्वर्ण दान करते हैं, वे नाना प्रकार के आभूषणों से विभूषित होकर उस मार्ग पर बड़े सुख से जाते हैं। जो लोग स्वर्ण दान करते हैं, वे सभी इच्छित भोगों से तृप्त होकर बड़े सुख से वहाँ जाते हैं। ॥52॥
 
People who donate gold travel on that road very happily, adorned with various kinds of ornaments. Those who donate gold, go there very happily, satisfied with all the desired pleasures. ॥ 52॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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