श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 48-49h
 
 
श्लोक  3.200.48-49h 
नीयते यमदूतैस्तु यमस्याज्ञाकरैर्बलात्॥ ४८॥
नरा: स्त्रियस्तथैवान्ये पृथिव्यां जीवसंज्ञिता:।
 
 
अनुवाद
यमराज के दूत यमराज की आज्ञा मानकर इस पृथ्वी पर आते हैं और स्त्री-पुरुष तथा अन्य जीवों को बलपूर्वक पकड़ लेते हैं ॥48 1/2॥
 
The messengers of Yamaraja, following the orders of Yamaraja, come to this earth and capture men, women and other living beings by force. ॥ 48 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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