Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.200.47-48h: रास्ते में बस खाली आसमान है, पानी नहीं। यह बहुत डरावना और दुर्गम लगता है। न पेड़ों की छाया है, न पानी और न ही कोई ऐसी जगह जहाँ सफ़र से थका इंसान पल भर आराम कर सके। 47 1/2 | mahabharat अध्याय 3.200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
आकाशं तदपानीयं घोरं कान्तारदर्शनम्।
न तत्र वृक्षच्छाया वा पानीयं केतनानि च॥ ४७॥
विश्रमेद् यत्र वै श्रान्त: पुरुषोऽध्वनि कर्शित:।
अनुवाद
रास्ते में बस खाली आसमान है, पानी नहीं। यह बहुत डरावना और दुर्गम लगता है। न पेड़ों की छाया है, न पानी और न ही कोई ऐसी जगह जहाँ सफ़र से थका इंसान पल भर आराम कर सके। 47 1/2
On its way there is only empty sky without water. It looks very scary and inaccessible. There is neither the shade of trees nor water and there is no place where a person tired of the journey can rest for a moment. 47 1/2
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥