श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  3.200.46 
षडशीतिसहस्राणि योजनानां नराधिप।
यमलोकस्य चाध्वानमन्तरं मानुषस्य च॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
महाराज! मनुष्यलोक और यमलोक के मार्ग में छियासी हजार योजन का अन्तर है ॥46॥
 
Maharaj! There is a difference of eighty-six thousand yojanas between the path of human world and Yamalok. 46॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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