श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  3.200.45 
मार्कण्डेय उवाच
सर्वगुह्यतमं प्रश्नं पवित्रमृषिसंस्तुतम्।
कथयिष्यामि ते राजन् धर्म्यं धर्मभृतां वर॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेयजी बोले, "हे पुण्यात्माओं में श्रेष्ठ युधिष्ठिर! आपने एक ऐसे विषय के बारे में पूछा है जो परम गोपनीय, पवित्र, धर्मसम्मत तथा ऋषियों द्वारा भी आदरणीय है। सुनिए, मैं इस विषय का वर्णन करता हूँ।"
 
Markandeya said, "Yudhishthira, the best among the virtuous! You have asked about a subject which is the most confidential, sacred, in accordance with the Dharma and is respected even by the sages. Listen, I will describe this subject." 45.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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