श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  3.200.44 
यमलोकस्य चाध्वानमन्तरं मानुषस्य च।
कीदृशं किम्प्रमाणं वा कथं वा तन्महामुने।
तरन्ति पुरुषाश्चैव केनोपायेन शंस मे॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
महामुनि! इस मनुष्यलोक से यमलोक कितना दूर है, कैसा है, कितना बड़ा है? और मनुष्य वहाँ के क्लेशों को किस उपाय से जीत सकते हैं? कृपया मुझे यह बताइए।॥44॥
 
‘Mahamuni! How far is Yamaloka from this human world, what is it like, how big is it? And by what means can humans overcome the troubles there? Please tell me this.’॥ 44॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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