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mahabharat 3.200.43: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय ! तत्पश्चात् भाइयों सहित धर्मराज युधिष्ठिर को बड़ी जिज्ञासा हुई और उन्होंने पुनः महात्मा मार्कण्डेयजी से यह प्रश्न पूछा -॥ 43॥   |   mahabharat अध्याय 3.200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  3.200.43 
वैशम्पायन उवाच
कौतूहलसमुत्पन्न: पर्यपृच्छद् युधिष्ठिर:।
मार्कण्डेयं महात्मानं पुनरेव सहानुज:॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय ! तत्पश्चात् भाइयों सहित धर्मराज युधिष्ठिर को बड़ी जिज्ञासा हुई और उन्होंने पुनः महात्मा मार्कण्डेयजी से यह प्रश्न पूछा -॥ 43॥
 
Vaishmpayana says - Janamejaya! Thereafter Dharmaraja Yudhishthira along with his brothers became very curious and they again asked Mahatma Markandeya this question -॥ 43॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)