श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  3.200.41 
धान्यं श्रमेणार्जितवित्तसंचितं
विप्रे सुशीले च प्रयच्छते य:।
वसुन्धरा तस्य भवेत् सुतुष्टा
धारां वसूनां प्रतिमुञ्चतीव॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य अपने परिश्रम से अर्जित और संचित धन-धान्य को किसी गुणवान ब्राह्मण को दान करता है, उस पर देवी वसुधा अत्यन्त प्रसन्न होती हैं और उस पर धन की वर्षा करती हैं ॥ 41॥
 
One who donates the wealth and grains, which he has earned and saved by his own efforts, to a virtuous Brahmin, Goddess Vasudha is very pleased with him and showers a torrent of wealth on him. ॥ 41॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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