श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  3.200.40 
येषां तटाकानि महोदकानि
वाप्यश्च कूपाश्च प्रतिश्रयाश्च।
अन्नस्य दानं मधुरा च वाणी
यमस्य ते निर्वचना भवन्ति॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
जो लोग अथाह जल से भरे हुए सरोवर और कुण्ड खुदवाते हैं, बावड़ियाँ, कुएँ और धर्मशालाएँ बनवाते हैं, अन्न का दान करते हैं और मधुर वचन बोलते हैं, उन्हें यमराज के वचन भी सुनने नहीं पड़ते अर्थात् यमराज उन्हें वचन मात्र से भी दण्ड नहीं दे सकते॥40॥
 
Those who dig lakes and pools filled with unfathomable water, construct stepwells, wells and dharamshalas, donate food grains and speak sweet words, they do not even have to listen to the words of Yamraj i.e. Yamraj cannot punish them even by mere words.॥ 40॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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