| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन » श्लोक 4-5 |
|
| | | | श्लोक 3.200.4-5  | मार्कण्डेय उवाच
वृथा जन्मानि चत्वारि वृथा दानानि षोडश।
वृथा जन्म ह्यपुत्रस्य ये च धर्मबहिष्कृता:॥ ४॥
परपाकेषु येऽश्नन्ति आत्मार्थं च पचेत् तु य:।
पर्यश्नन्ति वृथा ये च तदसत्यं प्रकीर्त्यते॥ ५॥ | | | | | | अनुवाद | | मार्कण्डेयजी बोले - "चार प्रकार के जीवन व्यर्थ हैं और सोलह प्रकार के दान व्यर्थ हैं। जो सन्तानहीन हैं, जो धर्म से विमुख हैं, जो सदा दूसरों की रसोई में खाते हैं और जो केवल अपने लिए भोजन पकाते हैं और देवताओं तथा अतिथियों को न देकर अकेले ही खाते हैं, उनका भोजन झूठा कहा गया है। अतः उनका जन्म व्यर्थ है (इस प्रकार इन चार प्रकार के लोगों का जन्म व्यर्थ है)।॥4-5॥ | | | | Markandeya said, "Four types of lives are useless and sixteen types of donations are useless. Those who are childless, those who are outcast from religion, those who always eat in the kitchen of others and those who cook food only for themselves and eat alone without giving it to the gods and guests, their food is said to be false. Hence their birth is futile (thus the birth of these four types of people is futile). ॥ 4-5॥ | | ✨ ai-generated | | |
|
|