Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.200.37-38: इसलिए अन्न सबसे महत्वपूर्ण है। इससे बढ़कर कुछ भी नहीं है। वेदों में अन्न को प्रजापति कहा गया है। प्रजापति को संवत्सर माना गया है। संवत्सर यज्ञ रूप है और सभी की स्थिति यज्ञ में है। 37-38. | mahabharat अध्याय 3.200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अन्नमेव विशिष्टं हि तस्मात् परतरं न च॥ ३७॥
अन्नं प्रजापतिश्चोक्त: स च संवत्सरो मत:।
संवत्सरस्तु यज्ञोऽसौ सर्वं यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥ ३८॥
अनुवाद
इसलिए अन्न सबसे महत्वपूर्ण है। इससे बढ़कर कुछ भी नहीं है। वेदों में अन्न को प्रजापति कहा गया है। प्रजापति को संवत्सर माना गया है। संवत्सर यज्ञ रूप है और सभी की स्थिति यज्ञ में है। 37-38.
Therefore food is the most important thing. There is nothing greater than it. In the Vedas food is called Prajapati. Prajapati is considered to be Samvatsara. Samvatsara is in the form of Yagya and everyone's position is in Yagya. 37-38.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥