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mahabharat 3.200.36-37h: जो मनुष्य अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को विधिपूर्वक भोजन कराता है, वह उस पुण्य के प्रभाव से प्रजापति लोक को जाता है।   |   mahabharat अध्याय 3.200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 36-37h
 
 
श्लोक  3.200.36-37h 
यथाशक्ति च यो दद्यादन्नं विप्रेषु संस्कृतम्॥ ३६॥
स तेन कर्मणाऽऽप्नोति प्रजापतिसलोकताम्।
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को विधिपूर्वक भोजन कराता है, वह उस पुण्य के प्रभाव से प्रजापति लोक को जाता है।
 
He who offers food prepared in a proper manner to the brahmanas according to his capacity, goes to the world of Prajapati by the effect of that pious act. 36 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)