| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन » श्लोक 35-36h |
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| | | | श्लोक 3.200.35-36h  | तस्मात् त्वं सर्वदानानि हित्वान्नं सम्प्रयच्छ ह॥ ३५॥
न हीदृशं पुण्यफलं विचित्रमिह विद्यते। | | | | | | अनुवाद | | अतः हे युधिष्ठिर! अन्य सब दानों को छोड़कर केवल अन्नदान ही करो। इस संसार में अन्नदान के समान अद्वितीय और पुण्यप्रद कोई दान नहीं है। | | | | Therefore, Yudhishthira, leave aside all other donations and continue to donate only food. There is no other donation in this world as unique and meritorious as the donation of food. 35 1/2. | | ✨ ai-generated | | |
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