श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 33-35h
 
 
श्लोक  3.200.33-35h 
पृच्छन्ति चात्र दातारं वदन्ति पुरुषा भुवि॥ ३३॥
अध्वनि क्षीणगात्राश्च पांसुपादावगुण्ठिता:।
तेषामेव श्रमार्तानां यो ह्यन्नं कथयेद् बुध:॥ ३४॥
अन्नदातृसम: सोऽपि कीर्त्यते नात्र संशय:।
 
 
अनुवाद
यदि कोई थका-मांदा, धूल से सने पैरों वाला दुबला-पतला पथिक भूखा-प्यासा आकर पूछे कि क्या यहाँ कोई है जो मुझे भोजन दे सके, तो जो विद्वान् पुरुष उसे भोजन का स्थान बताता है, वह भी अन्नदाता ही कहलाता है; इसमें कोई संदेह नहीं है। ॥33-34 1/2॥
 
If a weary and thin traveller with dusty feet comes hungry and thirsty and asks if there is anyone here who can give him food, then the learned man who tells him where to get food is also called the provider of food; there is no doubt about this. ॥33-34 1/2॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas