श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 32-33h
 
 
श्लोक  3.200.32-33h 
वसुन्धरां तु यो दद्याद् द्विजाय विदुरात्मने॥ ३२॥
दातारं ह्यनुगच्छन्ति सर्वे कामाभिवाञ्छिता:।
 
 
अनुवाद
जो विद्वान ब्राह्मण को भूमि दान करता है, उस दानदाता को सभी इच्छित भोग स्वतः ही प्राप्त हो जाते हैं । 32 1/2॥
 
The one who donates land to a learned Brahmin, all the desired enjoyments automatically come to that donor. 32 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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