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mahabharat 3.200.30-31h: जो मनुष्य सर्वोच्च जाति के शुद्ध ब्राह्मण को स्वर्ण दान करता है, उसे निरन्तर सौ स्वर्ण मुद्राएँ दान करने का फल प्राप्त होता है।   |   mahabharat अध्याय 3.200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 30-31h
 
 
श्लोक  3.200.30-31h 
सुवर्णस्य विशुद्धस्य सुवर्णं य: प्रयच्छति॥ ३०॥
सुवर्णानां शतं तेन दत्तं भवति शाश्वतम्।
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य सर्वोच्च जाति के शुद्ध ब्राह्मण को स्वर्ण दान करता है, उसे निरन्तर सौ स्वर्ण मुद्राएँ दान करने का फल प्राप्त होता है।
 
He who donates gold to a pure Brahmin of the highest caste, receives the reward of donating a hundred gold coins continuously. 30 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)