श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  3.200.28 
एवंविधेषु दातव्या न समृद्धेषु भारत।
को गुणो भरतश्रेष्ठ समृद्धेष्वभिवर्जितम्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
भारत ऐसे लोगों को ही दान देना चाहिए, धनवानों को नहीं। भारतश्रेष्ठ! धनवानों को देने से क्या लाभ? 28॥
 
India Only such people should donate, not the rich. Bharatshrestha! What is the benefit of giving to the rich? 28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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