| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन » श्लोक 26 |
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| | | | श्लोक 3.200.26  | कपिलाया: प्रदानात् तु मुच्यते नात्र संशय:।
तस्मादलंकृतां दद्यात् कपिलां तु द्विजातये॥ २६॥ | | | | | | अनुवाद | | कपिला गौ का दान करने से मनुष्य निःसंदेह सभी पापों से मुक्त हो जाता है। अतः कपिला गौ को सजाकर ब्राह्मण को दान करना चाहिए॥ 26॥ | | | | By donating a Kapila cow, a man is undoubtedly freed from all sins. Therefore, a Kapila cow should be decorated and donated to a Brahmin.॥ 26॥ | | ✨ ai-generated | | |
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