श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 24-25
 
 
श्लोक  3.200.24-25 
देवमाल्यापनयनं द्विजोच्छिष्टावमार्जनम्॥ २४॥
आकल्प: परिचर्या च गात्रसंवाहनानि च।
अत्रैकैकं नृपश्रेष्ठ गोदानाद्धॺतिरिच्यते॥ २५॥
 
 
अनुवाद
हे राजनश्रेष्ठ! मूर्तियों पर चढ़ाए गए चंदन और पुष्प आदि को यथासमय हटाना, ब्राह्मणों के बचे हुए भोजन को साफ करना, उन्हें चंदन की माला आदि से अलंकृत करना, उनकी सेवा-पूजा करना तथा उनके पैर दबाना आदि, ये प्रत्येक कर्म गौदान से भी अधिक श्रेष्ठ हैं।
 
O best of kings! Removing the sandalwood and flowers etc. offered to the idols in due time, cleaning the leftovers of the Brahmins, adorning them with sandalwood garlands etc., serving and worshipping them and massaging their feet etc., each one of these acts is more important than the donation of a cow. 24-25.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)