श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  3.200.22 
न तथा हविषो होमैर्न पुष्पैर्नानुलेपनै:।
अग्नय: पार्थ तुष्यन्ति यथा ह्यतिथिभोजने॥ २२॥
 
 
अनुवाद
कुन्ती नन्दन! अग्निदेव अतिथियों को भोजन कराने से उतने संतुष्ट नहीं होते, जितने कि वे यज्ञ, पुष्प और चन्दन अर्पित करने से होते हैं॥22॥
 
Kunti Nandan! Agni Dev is not as satisfied by offering food to guests as he is by offering sacrifices and flowers and sandalwood. ॥22॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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