श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.200.16 
श्लेष्मादिभिर्व्याप्ततनुर्म्रियमाणो विचेतन:।
ब्राह्मणा एव सम्पूज्या: पुण्यं स्वर्गमभीप्सता॥ १६॥
 
 
अनुवाद
जिसका शरीर कफ आदि से भरा हुआ है, जो मरणासन्न है और मूर्छित हो गया है, यदि वह पुण्यमय स्वर्ग प्राप्त करना चाहता है, तो उसे भी ब्राह्मणों का पूजन करना चाहिए ॥16॥
 
One whose body is filled with phlegm etc., who is dying and has become unconscious, if he wishes to attain the virtuous heaven, then he should also worship Brahmins. 16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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