श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.200.15 
पितृदैवतपूजाभिर्ब्राह्मणाभ्यर्चनेन च।
अनन्तं पुण्यलोकं तु गन्तासि त्वं न संशय:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! पितरों और देवताओं का पूजन करके तथा ब्राह्मणों का आदर करके तुम सनातन पुण्य लोक को जाओगे, इसमें कोई संदेह नहीं है॥15॥
 
O King! By worshipping the ancestors and gods and by respecting the Brahmins, you will go to the eternal virtuous world, there is no doubt about it. ॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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