श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  3.200.13 
मार्कण्डेय उवाच
जपैर्मन्त्रैश्च होमैश्च स्वाध्यायाध्ययनेन च।
नावं वेदमयीं कृत्वा तारयन्ति तरन्ति च॥ १३॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेय जी बोले, 'हे राजन! ब्राह्मण जप, मन्त्र-पाठ, होम, स्वाध्याय और वेदों के अध्ययन द्वारा वेद रूपी नौका बनाकर दूसरों को तथा स्वयं को भी भवसागर से पार उतारते हैं।
 
Mārkaṇḍeya said, 'O King! By creating a boat of Vedas through japa, mantra recitation, homa, self-study and study of the Vedas, the Brahmins help others to cross the ocean and themselves also.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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