श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 129
 
 
श्लोक  3.200.129 
परं हि दानान्न बभूव शाश्वतं
भव्यं त्रिलोके भवते कुत: पुन:।
तस्मात् प्रधानं परमं हि दानं
वदन्ति लोकेषु विशिष्टबुद्धय:॥ १२९॥
 
 
अनुवाद
तीनों लोकों में दान से बढ़कर कोई पुण्य कर्म नहीं हुआ। अब ऐसा कैसे हो सकता है? इसीलिए तो बुद्धिमान पुरुष कहते हैं कि दान ही संसार का सर्वश्रेष्ठ पुण्य कर्म है॥129॥
 
There has never been any act more meritorious than charity in the three worlds. How can it be so now? That is why men of good intellect say that charity is the best act of virtue in the world.॥ 129॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि दानमाहात्म्ये द्विशततमोऽध्याय:॥ २००॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें दानमाहात्म्यविषयक दो सौवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २००॥

 
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