श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 126
 
 
श्लोक  3.200.126 
ऋतुषु दशगुणं वदन्ति दत्तं
शतगुणमृत्वयनादिषु ध्रुवम्।
भवति सहस्रगुणं दिनस्य राहो-
र्विषुवति चाक्षयमश्नुते फलम्॥ १२६॥
 
 
अनुवाद
विद्वान पुरुष कहते हैं कि ऋतु के प्रारंभ के दिन दिया गया दान दस गुना अधिक फल देता है और संक्रांति आदि के दिन दिया गया दान सौ गुना अधिक फल देता है। इसी प्रकार ग्रहण के दिन दिया गया दान हजार गुना अधिक फल देता है और विषुव के दिन दान देने से मनुष्य उसका अक्षय पुण्य फल भोगता है।॥126॥
 
Learned men say that charity given on the day of the beginning of a season is ten times more and on the day of the solstices etc. it is hundred times more. Similarly, charity given on the day of an eclipse is thousand times more fruitful and by giving charity on the day of equinox, a person enjoys its inexhaustible virtuous fruit.॥126॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)