श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 124-125
 
 
श्लोक  3.200.124-125 
पर्वसु द्विगुणं दानमृतौ दशगुणं भवेत्॥ १२४॥
अयने विषुवे चैव षडशीतिमुखेषु च।
चन्द्रसूर्योपरागे च दत्तमक्षयमुच्यते॥ १२५॥
 
 
अनुवाद
पर्व के अवसर पर दिया गया दान दुगुना और ऋतु के प्रारंभ में दिया गया दान दस गुना पुण्यदायी होता है। उत्तरायण या दक्षिणायन के प्रारंभ के दिन, विषुव (तुला और मेष की संक्रांति) के दिन, मिथुन, कन्या, धनु और मीन राशि की संक्रान्ति के दिन तथा चंद्र और सूर्य ग्रहण के अवसर पर दिया गया दान अक्षय कहा गया है।॥124-125॥
 
Donation given on the occasion of a festival is double and donation given at the beginning of a season is ten times more meritorious. Donation given on the day of the beginning of Uttarayan or Dakshinayan, on the day of equinox (Sankranti of Libra and Aries), on the solstice of Gemini, Virgo, Sagittarius and Pisces and on the occasion of lunar and solar eclipse is said to be inexhaustible.॥124-125॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)