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mahabharat 3.200.120: मार्कण्डेयजी बोले - महाराज युधिष्ठिर! जो दान और धर्म की बातें आप मुझसे सुनना चाहते हैं, वे मुझे सदैव प्रिय हैं, क्योंकि वे महिमामय हैं॥120॥   |   mahabharat अध्याय 3.200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 120
 
 
श्लोक  3.200.120 
मार्कण्डेय उवाच
यत् त्वमिच्छसि राजेन्द्र दानधर्मं युधिष्ठिर।
इष्टं चेदं सदा मह्यं राजन् गौरवतस्तथा॥ १२०॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेयजी बोले - महाराज युधिष्ठिर! जो दान और धर्म की बातें आप मुझसे सुनना चाहते हैं, वे मुझे सदैव प्रिय हैं, क्योंकि वे महिमामय हैं॥120॥
 
Mārkaṇḍeya said, 'Maharaja Yudhishthir! The charity and religious matters which you wish to hear from me are always dear to me because they are glorious.॥ 120॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)