श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  3.200.12 
युधिष्ठिर उवाच
चातुर्वर्ण्यस्य सर्वस्य वर्तमाना: प्रतिग्रहे।
केन विप्रा विशेषेण तारयन्ति तरन्ति च॥ १२॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा, "हे महामुनि! जो ब्राह्मण चारों वर्णों से दान स्वीकार करते हैं, वे किस विशेष धर्म का पालन करके दूसरों का तथा स्वयं का भी उद्धार करते हैं?"
 
Yudhishthira asked, "O great sage! Those Brahmins who accept gifts from all the four castes, by following which special Dharma do they save others and themselves as well?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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